तुम्हे भी और मुझे भी

आज मिलना था तुमसेशाम की चाय परपहली मुलाकात थी नाना तुमने मुझे देखा थाऔर ना मैंने तुम्हेबस कमरे के आईने नेदेखा थातुम्हें भी और मुझे भीआज खत्म होने वाली थीकुछ अनकही बातो का सिलसिलाजी भर कर बतियाना था ना तुमसेचाय के ठंडी होने तकतुम भी तो लगा रही थीअपने आँखों में काजलताकि नजर ना लगे किसी कीतुम्हे भी और मुझे भीपर ना जाने क्योंये बादल सुबह से बरसा रहा हैक्या ये भी अपना इश्क किसी से फरमा रहा हैये आज शायद थमे नादेखो तुम छाता ले कर निकलनावरना ये बादल भींगा देगातुम्हे भी और मुझे भी—-अभिषेक राजहंस

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  1. Bindeshwar prasad sharma 16/07/2018

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