रिश्तों की जटिलता है – शिशिर मधुकर

तेरी बोली जो सुनता हूँ सुकूं कानो को मिलता है कमल मेरे हृदय का देखो तो इतरा के खिलता है बात आगे ज्यों बढ़ती है पवन सी चलने लगती है ये महका हुआ गुल भी फिर तो धीमे से हिलता है भ्रमर बौरानें लगते हैं मिलन की टीस उठती हैमयूरा मन का उल्लसित हुआ सपनों को सिलता है प्रेम तो रुक नहीं सकता मगर मिलना नहीं होता इंसानों की इस बस्ती में रिश्तों की जटिलता है लाज कांटे नहीं करते चोट देते ही रहते हैं कुदरत ने उन्हें मधुकर फक़त बख़्शी कुटिलता है शिशिर मधुकर

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2 Comments

  1. Dr Swati Gupta 12/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 13/07/2018

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