बुझती नहीँ है आग – शिशिर मधुकर

बुझती नहीँ है आग जो सीने में जल रहीसाथी तेरी कमी मुझे हर पल है खल रहीबर्फ की किश्ती मेरे जीवन की आज देखसागर में तैरती हुईं बस तन्हा ही गल रहीवैसे तो मेरे हर तरफ़ दुश्मन का जोर है आशा मगर मन में मेरे फिर भी है पल रहीतपते मरू में जैसे किसी पेड़ की छवि ज़िंदगी मुझको भी कुछ ऐसे ही छल रहीकैसे ना बेबसी का अब इजहार मैं करूँ दिन गुज़र चुका है और संध्या भी ढल रही शिशिर मधुकर

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11 Comments

  1. Anjali yadav 08/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 08/07/2018
  2. Anjali yadav 08/07/2018
  3. kiran kapur gulati 09/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 09/07/2018
  4. Abhishek Rajhans 09/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 09/07/2018
  5. C.M. Sharma 09/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 09/07/2018
  6. Rajeev Gupta 09/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 09/07/2018

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