तड़प सीने में होती है – शिशिर मधुकर

चोट खा के समझ आया कितने बेईमान चेहरे हैं पीर मिटती नहीं मन की घाव कुछ इतने गहरे हैं सुकूं हम ढूढ़ने को उसके सीने से लगें कैसे बड़ी ज़ालिम है ये दुनिया लगाए लाख पहरे हैं चले कुछ दूर में संग और फिर राहें जुदा पाईं मगर जज़्बात मन के आज भी सीनों में ठहरे हैं भले ही कितनी भी गहराई हो सागर के पानी में तड़प सीने में होती है दिखाती बस ये लहरें हैं प्रेम का गीत उनको क्या समझ में आएगा मधुकर बड़े संगदिल बने हैं जो और कानों से बहरे हैं शिशिर मधुकर

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8 Comments

  1. ANU MAHESHWARI 01/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 02/07/2018
  2. C.M. Sharma 02/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 02/07/2018
  3. Dr Swati Gupta 02/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 02/07/2018
  4. डी. के. निवातिया 03/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 03/07/2018

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