गुजर नहीं होता – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

हर इंसान को प्यार मयस्सर नहीं होतादुआ जितनी भी कर लो असर नहीं होती।कितने संभलने में टूटकर बिखर गयेसफ़र में हर वक्त हमसफर नहीं होता।कितना तड़पता है दिल बेचैन होकरसुकून मिलता है पर ज़फ़र नहीं होता ।ये कारवाँ ये सिलसिला है थमता नहींप्यार का खुमार  बेअसर नहीं होता।कुछ यादें मुलाकातें रह जाती है बसखो कर रहने में कदर नहीं होता।कोई वफ़ा कोई बेवफा कौन जानेकाश समझ आता तो बेघर नहीं होता।तन्हा जिंदगी, जिंदगी नहीं है बिन्दुबिना मुहब्बत के भी गुजर नहीं होता।

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  1. davendra87 30/06/2018

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