कभी सोचा करो- शिशिर मधुकर

कभी सोचा करो मालिक ने हमको क्यों मिलाया है बियाबान ज़िन्दगी में फूलों को फिर से खिलाया है प्यास बुझती नहीं अब तो कसक बढ़ती ही जाती है जाम अधरों की मय का तूने मुझे जब से पिलाया है मैं भी तन्हा नहीं जग में है हर पल साथ अब तेरा यकीन बातों ने तेरी अब तो मुझे इतना दिलाया है फूल और पात में कोई सदा झोली में गिरता है हरी शाखों को इंसा ने यहाँ जब भी हिलाया है राह फूलों की इतने पास थी जब मंज़िल चुनी मधुकर सभी कुछ छोड़ पर मैंने तो पैरों को छिलाया हैशिशिर मधुकर

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6 Comments

  1. davendra87 30/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 01/07/2018
  2. Kiran Kapur Gulati 01/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 01/07/2018
  3. C.M. Sharma 02/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 02/07/2018

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