मुहब्बत – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

मुहब्बत में हमारे दिल तो मिले पर कैसे हार हो गयीमिलने गये थे अपना समझ के उनसे तक़रार हो गयी।अब हमें संभल कर ही देखना और पढ़ना होगा उनकोनज़र किसकी पड़ी थी यूंँ मुझ पर जो मैं लाचार हो गया।प्यार में इस तरह की रार तो हरदम चलते ही रहेंगेमेरी कोशिशों से वो मानने को अब तैयार  हो गयी ।दिल को वक्त पर समझना और समझाना मुझे आ गयाजाग गयी दीवानगी   मिलने के लिए बेकरार हो गयी।मन के सारे गिले – शिकवे मिट गये हम एक हो गयेभेद कुछ भी न रहा  मेरे मन में अब प्यार हो गया।

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2 Comments

  1. C.M. Sharma 30/06/2018
  2. Rajeev Gupta 30/06/2018

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