दर्द का एहसास – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

ëइन ख्यालों में कैसे उनका दीदार हो गयासोच कुछ और रहा था, लगता है प्यार हो गया।अक्सर तन्हाई में, भटक जाता मन कुछ इस तरहदिल के खालीपन में उनका इंतजार हो गया।अब न तो चैन मिलता है, न सुकून है दिल मेंये दिल, दिल से मिलने के लिए बेकरार हो गया।खोये खोये से रहना, मुझे अच्छा नहीं लगताआँखों के सामने इक, खड़ी दीवार हो गया।उनसे मिलना, बातें करना, इक धोखा ही थाअच्छी भली चल रही थी जिंदगी, बेकार हो गया।दर्द का एहसास इधर है ‘बिन्दु’ उधर क्या मालूमचिराग रोशनी के लिए जलाया, अंगार हो गया।

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3 Comments

  1. kiran kapur gulati 23/06/2018
  2. डी. के. निवातिया 23/06/2018
  3. Bhawana Kumari 25/06/2018

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