वक्त बे – वक्त – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

नज़र का खेल है जो कहते हैंदिल में हम आपके ही रहते हैं।ये मत सोचो कि ये नादानी हैप्यार होता क्या है समझते हैं।दर्द देता तो सुकून भी देतीप्यार करता वही जो सहते हैं।ये बैचैन भी दिल को करता हैनींद आती भी नहीं तड़पते हैं।वक्त बे – वक्त का ये नजारा हैकरते हैं याद और मचलते हैं।कुछ यादों में कुछ मुलाकातों मेंचेहरा दिल में ही लेकर पढ़ते हैं।

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2 Comments

  1. डी. के. निवातिया 23/06/2018
  2. Bhawana Kumari 25/06/2018

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