सत्य उगलती कलम – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

सोच में डूबे चिंतन करते, अपने आप को देखा हैअपनी लेखनी अंतर मन में, हमनें उतरते देखा है  ।ये कलम जज्बात है कहती सत्य उगलती ऐसी हैचलती थी जिसकी भी हस्ती उसे भी डरते देखा हैं ।कलम का जादू चलता है तो, शंखनाद गूँज जाता हैअच्छे अच्छे रण वीरों को हमने, आहें भरते देखा  है ।अड़ियल को भी ठंढा कर देती, गरम खून की नाड़ीजो भी इसको समझ है पाया, उसे उभरते देखा है ।मैंने सुना बाल्मीकि , काली – तुलसी – कबीर की वाणीहर कलम के वीरों को हमने, गुणगान ये करते देखा है  ।वेद – पुराण – कुरआन – बाइबिल, गुरुग्रंथ शास्त्रों  सेहमने ही संस्कार – संस्कृति, समाज में चलते देखा है  ।

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6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 22/06/2018
  2. C.M. Sharma 22/06/2018
  3. Bindeshwar Prasad sharma 22/06/2018
    • C.M. Sharma 22/06/2018
  4. Bindeshwar prasad sharma 23/06/2018

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