लम्हें भी ठहरे हैं – शिशिर मधुकर

तेरी एक दीद को हम तो यहाँ कब से तरसते हैं वो बादल गड़गड़ाते हैं मगर फिर ना बरसते हैं उनको मालूम है हाथों में उनके बस करिश्में हैं मगर फिर भी दवा बीमार ए दिल को ना परसते हैं अपनी तुम सोचते हो एक बार तुम मेरी जगह आओ बिना बदनामियों के प्यार की कसमें तो निभाओ मैं तन्हा झेलती हूँ दर्द सब तुमसे बिछुड़ने के मगर फिर भी सदा कहती हूँ तुम बस चैन ही पाओ मुझे एहसास है हर ओर अब दुनिया के पहरे हैं दर्द भी खत्म हो कैसे हों घाव कुछ इतने गहरे हैं मगर जज़्बात अब कुछ इस तरह तुमसे जुड़े अपने जहाँ छोड़ा था तुमने हाथ वो लम्हें भी ठहरे हैं मुझे तुम भूल जाओ या मेरी बातों को तुम मानोमैं हर पल साथ हूँ तेरे ये सच जल्दी से पहचानो मुहब्बत हो गई एक बार तो फिर मर नहीं सकती भले ही दो बदन हों हम उन्हें एक जान तुम जानो शिशिर मधुकर

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8 Comments

  1. C.M. Sharma 21/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 21/06/2018
  2. kiran kapur gulati 22/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 22/06/2018
  3. ANU MAHESHWARI 22/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 22/06/2018
  4. Shishir "Madhukar" 22/06/2018

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