तिनकों से ढहते हैं – शिशिर मधुकर

मुहब्बत जिनसे है मुझको वो हरदम दूर रहते हैं तन्हा तड़पाते हैं मुझको खुद भी तो पीर सहते हैं एक दिन जान ले जाएगी ये दूरी जो बैरन हैं मानते हैं यही सच है मगर खुलकर ना कहते हैं मिलन की बात कहता हूँ तो बस मुस्कान भरते हैं समुन्दर में समाने को ही तो धारे ये बहते हैं मुहब्बत नींव में जिस महल की लगने नहीं पाई देख लो बुर्ज ऊँचे भी वहां तिनकों से ढहते हैं फकत रिश्ता बनाने से कोई अपना नहीं होता एक यही बात मधुकर सब यहाँ अपनों से कहते हैं शिशिर मधुकर

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12 Comments

  1. kiran kapur gulati 17/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 17/06/2018
  2. Dr Swati Gupta 17/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 18/06/2018
  3. ANU MAHESHWARI 17/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 18/06/2018
  4. C.M. Sharma 18/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 18/06/2018
  5. Krishna 18/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 18/06/2018
  6. डी. के. निवातिया 19/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 20/06/2018

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