ग़ज़ल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

खुद को संभालो इतना कि बस चलना आ जायेराह जैसी भी हो, वक्त पर बदलना आ जाये।दकियानूसी से, रंगत यह बदल जायेगीरुख़ हवा का देखके, आपको जलना आ जाये।दुनिया एक खेल – तमाशा, खुदा इसके मदारीउनके इशारे पर बस, हमें मचलना आ जाये।जी हुजूरी में अपने आप को, बर्बाद मत करदुआ है दलदल से, सबको निकलना आ जाये।मुस्कराते रहे जिंदगी, बस यही तमन्ना हैबेफिक्र पानी सा जिंदगी को, ढलना आ जाये।अपने आप को तुम , इतना बुलंद करो बिन्दुकि सबके सामने तुम्हे भी, महकना आ जाये।

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