अर्पण….सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

तू मेरा मैं तेरी फिर किसे और क्या करूँ मैं अर्पण…भाव तुम से तुम्हीं भाव हो किसका करूँ समर्पण…निर्जीव ‘मैं’ में ‘तुम’ प्राण हो किसका करूँ मैं तर्पण….फिर भी कहते हो तो लो किया तुम्हें तुम्हीं को अर्पण…तेरी माया तेरी छाया तेरा रूप मुखरित ये संसार है….छल कपट का फिर बोल यहां पे होता क्यूँ व्यापार है…जाने है तू सब कुछ लेकिन तुझ को नहीं स्वीकार है….बिना समर्पण कैसे कहे तू मैं तेरा तू मेरा ही आकार है…भावों का अर्पण बन दर्पण रूह का करे विस्तार है…इश्क़ अटारी चढ़ बोला वो खुदा मिलन आधार है…जो डूबा इसमें गहरा वो गूंगे बहरे का संसार है….इश्क़ समर्पण खुदा को अर्पण होता बस निस्तार है….\/सी.एम्.शर्मा (बब्बू)

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12 Comments

  1. डी. के. निवातिया 15/06/2018
    • C.M. Sharma 18/06/2018
  2. Shishir "Madhukar" 15/06/2018
    • C.M. Sharma 18/06/2018
  3. ANU MAHESHWARI 15/06/2018
    • C.M. Sharma 18/06/2018
  4. Bindeshwar prasad sharma 15/06/2018
    • C.M. Sharma 18/06/2018
  5. Dr Swati Gupta 17/06/2018
    • C.M. Sharma 18/06/2018
  6. davendra87 19/06/2018
    • C.M. Sharma 25/06/2018

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