Il स्मृति ll

॥ स्मृति ॥नाम मेरा है ‘स्मृति’, मेरे जागरण से प्रकट होता है भूतकाल ।मेरे ही अस्तित्व से संभव होते, भविष्य की घटनाओं के हाल ॥ 1 ॥इसी विश्वास के संबल पर, मानी नहीं जीवन से हार ।बहुत कुछ खोकर भी मैंने, नैय्या अपनी लगाई पार ॥ 2 ॥बचपन में माँ, दादा-दादी, और बड़े भाई का पाया प्यार ।पिता को मैंने कभी ना देखा, जो समझाता जीवन का सार ॥ 3 ॥पिता को जब भी मैंने पूंछा, माँ ने केवल यह बतलाया ।बादलों के बीच में रहते वे, कर के इशारा दिखलाया ॥ 4 ॥आखिर वह दिन आ ही गया, जब सत्य प्रकट हो जाना था ।जन्म से पूर्व ही खोया पिता को, तब मैंने यह जाना था ॥ 5 ॥मेरे गर्भकाल में ही, वे हुए थे दुर्घटना के शिकार ।मुझे गोद में लिए बिना ही , चले गये थे जीवन के उस पार ॥ 6 ॥जन्म से पूर्व ही खोया पिता को, ‘स्मृति’ का पाया मैंने नाम ।मन में कौंधता रहा प्रश्न, क्यों हुआ विधाता मुझ पर बाम ॥ 7 ॥स्कूल में जब देखा साथियों को, अपने-अपने पिता के साथ ।अविरल आँसू बहे आँख से, मुँह को छिपाया रख कर हाथ ॥ 8 ॥एक दिन ‘टीचर’ ने समझाया, ईश्वर की इच्छा को स्वीकारो ।उसकी शरण में जाकर मन से, जीवन संघर्ष को ललकारो ॥ 9 ॥केवल तुम्हीं नहीं भागी इसकी, बहुतों ने बहुत कुछ खोया है ।साहस समेट फिर से अपना, सपनों का महल संजोया है ॥ 10 ॥तुम्हारे ये बहते ऑसू, पिता को वापस ना ला पाएंगे ।तुम्हारे दु:ख से होकर दु:खी, परिजन अवश्य दु:ख पाएंगे ॥ 11 ॥आखिर मैंने किया स्वीकार, पिता को अब ना आना है ।केवल उनकी संजों स्मृतियाँ, जीवन सफल बनाना है ॥ 12 ॥पिता के स्मृतियाँ हुईं विस्मृत, ज्यों ज्यों बीतता गया बचपन ।दादा-दादी के अनुशासन में रहकर, जीवन को मिली राह नूतन ॥ 13 ॥क्षण-क्षण समय रहा बीतता, बचपन में ही पाया ज्ञान ।बिना सहारे जीवन कटता कैसे, प्रति-पल मुझको होता भान ॥ 14 ॥आँसू पोंछे आँखों से, कर्तव्य को था मैंने अपनाया ।जीवन के संघर्षों ने, इक नव पंथ था दिखलाया ।। 15 ॥माँ को जीवन में, कमीं का न हो एहसास ।लक्ष्य रखा दादा-दादी ने, यथासंभव था किया प्रयास ॥ 16 ॥किन्तु कमीं जो मिली माँ को, क्या कोई पूरी कर सकता था ।एकांत में बहती अश्रुधार को, रोक कोई क्या सकता था ॥ 17 ॥शनै:-शनै: बीता जीवन, कॉलेज करने को आई पार ।समय ने ली फिर करवट, आँसुओं की फिर निकली धार ॥ 18 ॥छ: माह के अल्पकाल में, दादा-दादी न छोड़ा साथ ।इक साया और उठा सिर से, जिसका था हम पर सबल हाथ ॥ 19 ॥माँ ने ओढ़ा जिम्मा सिर पर, जीवन नैय्या को पथ फिर दिखलाया ।जीवन के संघर्ष मार्ग का, संकल्प फिर हमने था दुहराया ॥ 20 ॥जीवन धारा फिर लगी बह्ने, शिक्षा की आखिर मैंने पूर्ण ।किन्तु धनाभाव के कारण, मेरे सपने रहे अपूर्ण ॥ 21 ॥आखिर ईश्वर की दृष्टि हुई अनुकूल, भैय्या की मेहनत हुई सफल ।सरकारी नौकरी हुई प्राप्त, जिसकी थी आवश्यक्ता पल-प्रतिपल ॥ 22 ॥भैय्या का ब्याह हुआ, जीवन ने इक बार पुन: ली करवट ।जीवन को कुछ संतोष मिला, मुख पर प्रसन्नता हुई प्रकट ॥ 23 ॥माँ को जीवन जीने का, इक नव आश्रय ज्यों था मिला ।जीवन रूपी बगिया में, ज्यों था हर्षरूपी पुष्प खिला ॥ 24 ॥बरस बीतते नवजात शिशु की, गूँजी घर की किलकारी ।जीवन भरा नयी उमंगों से, मानो मिलीं खुशियाँ सारी ॥ 25 ॥विधाता को है क्या मंजूर, जान न कोई पाता है ।पल-पल पर रंग बदलते जीवन का रहस्य, जान न कोई पाता है ॥ 26 ॥ह्रदयाघात ने तोड़ा माँ को, जाकर बिस्तर पकड़ाया ।सेवा सहाय की बहुत किन्तु, प्रयास न कोई काम आया ॥ 27 ॥मंदिर जाकर मांगी मन्नत, दरगाह पर जा टेका माथा ।किन्तु घटित हुआ वही, जिसकी रच रखी थी ईश्वर ने गाथा ॥ 28 ॥तीन माह के अल्प समय में, माँ ने झेले ह्र्दयाघात चार ।अंतत: टूटी डोर श्वाँस की, हुईं समस्त दु:खों से पार ॥ 29 ॥आंखों के सामने छाया अंधेरा, मैंने स्वयं को ‘अनाथ’ था पाया । सारे सहारे उठे सिर से, दु:खों की छायी काली छाया ॥ 30 ॥काटे हम सबने जीवन के, वे दु:खद क्षण रह कर मौन ।कहो भला बुरे समय में, सहायता भी कर सकता कौन ॥ 31 ॥सुबह शाम धैर्य बंधाने वालों का, तांता सा था लग जाता ।बातों से देते राहत, मन की शान्ति न कोई दे पाता ॥ 32 ॥हम सब का धैर्य था टूट गया, जीवन फिर भी जीना ही था ।ईश्वर की इच्छा के समक्ष, नतमस्तक होना ही था ॥ 33 ॥पर वह ‘करतार’ भी बड़ा दयालू, कुछ लेता है कुछ देता है ।लेना देना कर में उसके, मानव जीवन नैय्या खेता है ॥ 34 ॥ढ़ाढ़स देने वालों को, आखिर हमने किया दूर ।संघर्षों से खुद लड़ने हेतु, समेटा साहस फिर भरपूर ॥ 35 ॥दु:खों के थपेड़े पड़े हम पर अवश्य, पर स्नेह प्रेम का ना हुआ ह्रास ।जीवन सरिता पर नाँव लगी बहने, लेकर जीवन की नूतन आस ॥ 36 ॥बड़ा भाई ही था अब पिता मेरा, माँ का स्थान लिया था भाभी ने ।नन्हा बालक मेरा बना साथी, खुशियों को फिर पाया हम सबने ॥ 37 ॥भैय्या को कर्तव्य ना भूला था, मेरे विवाह का किया प्रयास ।परिश्रम उनका रंग लाया, जीवन में छाया नव उल्लास ॥ 38 ॥मेरा विवाह सम्पन्न हुआ, जीवन में फिर आई उमंग ।भैय्या ने कन्यादान किया, जीवन को दिया इक नूतन रंग ॥ 39 ॥सभी स्वर्गीय जनों की स्मृतियों को कर प्रणाम, नव गृह को मैंने अपनाया ।पंख लगाकर समय लगा उड़ने, जीवन में छायी खुशियों की छाया ॥ 40 ॥माता ने दिया था नाम ‘स्मृति’, मेरी स्मृतियों की छाया ।पल प्रतिपल रहती अंतर में, भेद न कोई ले पाया ॥ 41 ॥भूतकाल से मिले दु:ख, पीड़ित अवश्य कर देते थे ।पर वर्तमान से मिलते सुख, पीड़ा पर मरहम अवश्य रख देते थे ॥ 42 ॥बाल्य-काल बन गया अतीत, नव चरण में हुआ प्रवेश ।जीवन की बहती धारा में, रहा न कोई कहीं क्लेश ॥ 43 ॥समय बीतते दो बेटों की, किलकारियाँ गूँजीं आँगन में ।इक अकल्पनीय आनन्द व्याप्त हुआ, ज्यों मेरे रिक्त पड़े मन में ॥ 44 ॥समय की गति होती निश्चित, जीवन को देता सुख-दु:ख ।जब यह भरता खुशियाँ जीवन में, मानव भूल जाता सारे दु:ख ॥ 45 ॥इसकी गति की उमंग में खोकर मानव, सारे दु:ख विस्मृत कर देता है ।जब गति इसकी ठहरती है, तब मानव अपनी सुध लेता है ॥ 46 ॥मेरे अश्रुपूर्ण जीवन में, ऐसे दिन भी आएंगे ।बीते समय की याद भुलाकर, खुशियाँ भर कर जाएंगे ॥ 47 ॥ऐसी कल्पना से ही शरीर में, सिहरन सी उठ जाती थी ।गए काल की कल्पनाओं की, स्मृति भी मिट जाती थी ॥ 48 ॥हंसते खेलते जीवन का, दूसरा चरण भी बीत गया ।आप बराबर हुए बेटे, हंसते हुए जीवन बीत गया ॥ 49 ॥किन्तु मेरे जीवन में, खुशियों की जब फसल लहलहाई ।आशा की किरण ज्योति, नव प्रकाश से जगमगाई ॥ 50 ॥उसी समय मेरे जीवन में, विपत्तियों का पड़ा ‘पाला’ ।आशाओं को किया ध्वस्त, नव विपदा में जीवन डाला ॥ 51 ॥माँ ने कहा था बचपन में, अन्याय ना ईश्वर करते हैं ।जो हमने बोया ‘अतीत’ में, भाग उसी का भरते हैं ॥ 52 ॥तीसरे चरण में ज्यों पड़े पाँव, पति को बीमारी ने पकड़ा ।ज्यों ज्यों किया इलाज, त्यों तयों और जोर से ज्यों जकड़ा ॥ 53 ॥पूजा, पाठ मन्नतें विनती, कुछ भी काम नहीं आईं ।पति को आखिर पकड़ाया बिस्तर, विपत्तियों की दीं परछाईं ॥ 54 ॥बेटों के साथ पति की सेवा करते, जीवन का नवक्रम हुआ आरम्भ ।सब कुछ मैंने स्वीकार किया, नव दायित्वों का हुआ प्रारम्भ ॥ 55 ॥इस नव दायित्व का वहन करते, जीवन के बीते बरस पाँच ।होनी ने नव रंग दिखाया, मेरे सुहाग पर आई आँच ॥ 56 ॥जीवन का सबसे सबल सहारा, आखिर मुझको छोड़ चला ।कहो मानव के वश में है क्या, होनी रोकने का सामर्थ्य भला ॥ 57 ॥ईश्वर की इच्छा स्वीकारना था, सदा से मेरे भाग्य का लेख ।मेरी सहन-शक्ति की लेगा परीक्षा कितनी, मैं कैसे सकती थी देख ॥ 58 ॥भाग्य के लिखे को फिर मैंने स्वीकारा, अगली परीक्षा हेतु हुई तैयार ।देखना था यह समय का चाबुक, करेगा कौन सा नया वार ॥ 59 ॥बेटों के सहारे जीना था, नैय्या को पार लगाना था ।पति ने दायित्व जो छोड़ा मेरे लिए, आगे उसे बढ़ाना था ॥ 60 ॥ विपत्तियों से लड़ने की अभ्यस्त थी मैं, विचलित कदापि न हो सकती थी ।महाविपत्ति की काली छाया, पथ मेरा रोक न सकती थी ॥ 61 ॥विधाता को इस जन्म में केवल, दु:ख ही मेरे भाल लिखा ।मेरे जीवन की गाथा में, कर्तव्य का मार्ग ही मुझे दिखा ॥ 62 ॥कर्तव्य का मार्ग अपनाकर, बेटों को ढ़ाढ़स था दिलवाया ।आती जाती सुख दु:ख की छाँव से, परिचित था उंनको करवाया ॥ 63 ॥इक बार परिश्रम फिर सफल हुआ, बेटे पाँवों पर खड़े हुए ।मेरे प्रयास की बेल खिली, हो सिंचित पत्ते फिर हरे हुए ॥ 64 ॥जीवन में मिले धोखे इतने, कि हंसी भी पर रोना आता था ।इक क्षण की हंसी कब दे आँसू, विश्वास नहीं हो पाता था ॥ 65 ॥नित रंग बदलता जीवन, जीने को नव गति देता है ।पर्वत समान हो दु:ख भले, भुला उसे भी देता है ॥ 66 ॥दुर्भाग्य कोसना छोड़ कर हमने, इक-दूजे को दिया सहारा ।बेटे अवलम्ब बने मेरे, दुर्भाग्य फिर हमसे हारा ॥ 67 ॥ईश्वर से मेरा था सवाल, क्यों जीवन में ऐसा आता मोड़ ।जिसकी मुझे सर्वाधिक आवश्यक्ता, वह चल देता है मुझे छोड़ ॥ 68 ॥मन को विचारों की मथानी से मथ, मैंने स्वयं उत्तर पाया ।उत्तर से मन को विश्राम मिला, छंटी अवसाद की व्यापित छाया ॥ 69 ॥तुम्हारे हित में अच्छा है, जीवन के रहस्य को ना जानो ।ईश्वर ने जो पथ दिया तुम्हें, उस पर चलने में हित मानो ॥ 70 ॥वह सबका न्यायकर्ता, अन्याय कभी ना कर सकता ।मानव कितना भी करे प्रयत्न, करनी से कदापि ना बच सकता ॥ 71 ॥तुमने जीवन में बहुत कुछ खोकर भी, अंतत: बहुत कुछ पाया है ।जीवन को है जो राह मिली, वह तुम्हारे ही कर्मों की छाया है ॥ 72 ॥मन में चलते मंथन का, आखिर सार प्रकट हुआ ।अनुत्तरित प्रश्न हुआ उत्तरित, तब जाकर मन संतुष्ट हुआ ॥ 73 ॥हम सबने मिलकर जीवन को, फिर से नव पथ पर दौड़ाया ।जो पास था अपने शेष बचा, उसे ही जीवन में अपनाया ॥ 74 ॥जो खोया था उसे भूलकर, पूर्ण करने को शेष काम ।जीवन में फिर नव राह चुनी, मन को ताकि मिले विष्राम ॥ 75 ॥ फिर इक बार मिली मंजिल, बेटे पैरों पर ख्ड़े हुए ।प्रतीत हुआ मानो इक बार फिर, जगे भाग ज्यों सोए हुए ॥ 76 ॥बेटों के फिर ब्याह किए, लेकर ईश्वर का नाम ।प्रतिपल मन में रहता संदेह, नाजाने क्या रंग दिखाए ढ़लती शाम ॥ 77 ॥बेटों पोतों संग जीवन ने पकड़ी गति, बीते जीवन के बरस पाँच ।मन को थोड़ी संतुष्टि मिली, शायद अब ना आए कोई आँच ॥ 78 ॥मन की सोची यदि हो जाए सच, दु:ख का जीवन में फिर क्या काम ।मानव सदैव सोचता भला, होनी करती अपना काम ॥ 79 ॥बड़ी बहू को इक दिन कहते सुना, माता जी का बोझ उठाएं क्यों ।इक और तुम्हारा भाई है, रहता है घर में कोई अतिथि ज्यों ॥ 80 ॥समझदारी से काम करो, घर का अब विधिवत बटवारा करो ।व्यर्थ के खर्चों का करो त्याग, अपने परिवार पर ध्यान धरो ॥ 81 ॥माता की कर सेवा जग में, कुछ भी ना यश पाओगे ।धन के लालची कहलाकर, बदनाम भले हो जाओगे ॥ 82 ॥बड़ी बहू के सुनकर विचार, मन हुआ अत्यधिक खिन्न ।चौथे पड़ाव में जीवन के, बचा देखने को यही दिन ॥ 83 ॥छोटी बहू निकली और सयानी, बोली माता जी ममता छोड़ो ।घर ग्रहस्थी दो बेटों को, ईश्वर से नाता जोड़ो ॥ 84 ॥यह उजाड़ घर बेंच कर अपना, बेटों को दे दो उनका भाग ।व्यवहारिक्ता का जीवन अपनाओ, माया मोह का करो त्याग ॥ 85 ॥नए घर में एक कक्ष होगा, तुमको आरक्षित ।जीवन काटना सुख से अपना, रहकर सब भाँति सुरक्षित ॥ 86 ॥बेटों को मैंने देखा, उनके मन का जानना चाहा हाल ।दोनों मिले निज पत्नी से सहमत, चलने को आतुर थे नव चाल ॥ 87 ॥जीवन भर की तपस्या का, अब यह परिणाम लगा दिखने ।त्याग तपस्या का मिला यह फल, समझा बोझ मुझे सबने ॥ 88 ॥निद्रा दूर भगी आँखों से, ईश्वर को तब मैंने पुकारा ।क्या त्यागियों के हेतु रचयिता, यही बचा है न्याय तुम्हारा ॥ 89 ॥घर को मैं ना दूँगी बिकने, आकर तुम चाहे स्वयं कहो ।तुम हो जगत के रचयिता, मैं करूं क्या अब तुम ही कहो ॥ 90 ॥ ईश्वर ने मुझे दिया उत्तर, दर्शन नव बृद्धदम्पत्ति के करवाये ।छोड़ा था जिन्हें उनके बेटों ने, परोपकार का मार्ग थे अपनाये ॥ 91 ॥असहायों की नित करते मदद, ईश्वर को रहते हुए समर्पित ।निज घर को बनाए थे आश्रम, अनाथों हेतु किए खुद को अर्पित ॥ 92 ॥मेरे प्रश्न का मिला उत्तर, ईश्वर का मैंने आभार किया ।भविष्य हेतु नव राह चुनी, मन में एक निर्णय कठोर लिया ॥ 93 ॥बेटे बहू उत्सुक थे, जानने को मेरा विचार ।दो टूक शब्दों में मैंने रखा, अपने विचारों का निश्चित सार ॥ 94 ॥इस घर में मुझ ‘स्मृति’ की बसी स्मृति, पति की यादों का बसेरा है ।यह कदापि ना बिक सकता है, जब तक मेरी सांसों ने डाला डेरा है ॥ 95 ॥मेरे बाद भी इस घर को, बेंच नहीं तुम पाओगे ।यह होगा असहायों हेतु समर्पित, इसमें पैर नहीं रख पाओगे ॥ 96 ॥अब तक जीवन में सबने मुझे छोड़ा, श्वासों की डोर टूटने पर ।श्वासों के चलते ही मैने त्यागा तुम्हें, ह्रदय पर रख कर पत्थर ॥ 97 ॥तुम हो स्वतंत्र मेरी ओर से, जब चाहो तुम दोनों जा सकते हो ।मेरा निर्णय है अगाध अटल, परिवर्तन ना इसमें ला सक्ते हो ॥ 98 ॥परिवार छोड़ चला मुझको, नव पथ मैंने पर रखा पाँव ।नए अनुभव हुए जीवन में, समय की देखते धूप छाँव ॥ 99 ॥असहायों की करते मदद, आयु हुई अस्सी के पार ।बेटों ने पलट कर ना सुधि ली, जिनके हेतु मैंने सब कुछ दिया हार ॥ 100 ॥इक दिन अखबार में पढ़ी खबर, मेरा बड़ा बेटा हुआ दुर्घटनाग्रस्त ।माँ की ममता ने मुझे झकझोरा, दृढ़ निश्चय मेरा हुआ ध्वस्त ॥ 101 ॥बदहवास हो पहँची अस्पताल, जानने को बेटे का हाल ।बहू ने कटु व्यंग्य कसा, बोली माता जी हो खुशहाल ॥ 102 ॥ह्रदय पर पड़ती चोटों ने, मुझे बनाया था इतना मजबूत ।तीव्र व्यंग्य ना कर सकते थे मुझे विचलित, अंतर से मैं थी मजबूत ॥ 103 ॥दिन रात की मेरी प्रार्थना से, बेटे की दशा में हुआ सुधार ।जीवन में पहली बार ईश्वर ने कुछ लौटाया, मैंने प्रकट किया उसका आभार ॥ 104 ॥आखिर इक दिन बेटे ने आकर कहा मुझसे, माँ तुम हमारे साथ रहो ।जैसे तुम रहना चाहो रहो, हम साथ तुम्हारे जब तुम कहो ॥ 105 ॥मैंने कहा इस “स्मृति” की स्मृति में, बस गयी असहायों की आह ।जीवन में यह ना हो सकती अलग, केवल उन्हें देगी पनाह ॥ 106 ॥अपनी राह तुमने स्वयं चुनी, उसके पथ को तुम स्वीकारो ।मैं ना अब जाऊँगी साथ तुम्हारे, मेरी ओर ना और निहारो ॥ 107 ॥जीवन में अब मेरी स्मृति में, केवल दीन असहाय बसे ।जिनकी सहायता हेतु मैं हूँ तत्पर, स्वयं को सब भाँति कसे ॥ 108 ॥जीवन की बहती धारा में, इक दिन सब कुछ बह जाना है ।इस ‘स्मृति’ की स्मृति शेष बचेगी, शेष सभी मिट जाना है ॥ 109 ॥बेटे भी कभी-कभी अब, मुझसे मिलने आते हैं ।मेरे पति की निशानी बनी मंदिर, शीष झुकाकर जाते हैं ॥ 110 ॥मेरे जीवन का नाँव, लगेगी जब आकर किनारे ।स्मृतियाँ मेरी रहेंगी सुरक्षित, जीवन की यादों को सब भाँति संवारे ॥ 111 ॥अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव

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5 Comments

  1. C.M. Sharma 14/06/2018
  2. अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव 14/06/2018
  3. डी. के. निवातिया 15/06/2018
  4. Bindeshwar prasad sharma 15/06/2018
  5. अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव 16/06/2018

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