गज़ल – ए – चाँद – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

गुरु जी, मैं आपका अब मुरीद बन बैठा हूँचाँद दिखा है , इसलिए मुफ़ीद बन बैठा हूँ।आप तो रहनुमा हैं, मेरे इन ख्यालों केचरणों में आपके एक, उम्मीद बन बैठा हूँ।आप से सीखे हर लफ्ज़, हौसला जाहिर हैयह तहरीर पढ़कर मैं , शदीद बन बैठा हूँ।उनके देरे दिल में, मुझको पनाह तो मिलीअपने भरोसे का, चश्म – ए-दीद बन बैठा हूँ।हित सबका हो भला, ये कौन नहीं चाहेगासीमा पर वतन के लिए, शहीद बन बैठा हूँ। मुरीद – शिष्य, फीद – उपयोगी, शदीद – प्रवल ।

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2 Comments

  1. C.M. Sharma 14/06/2018
  2. डी. के. निवातिया 15/06/2018

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