मेरे देश का अन्नदाता

मेरे वतन में खुशहाल है सभीनेता ,व्यापारी और कवीबस एक भूखा जगे , और सो जाता हैमेरे देश का अन्नदाता , बेबस लाचार सा रह जाता हैकिताबों में उसकी पेहचान बडी हैजीवन की लडाई उसने , हल से लड़ी हैहकीकत में वो अपनो से लडता हैदिन में देखे सपनो से ड़रता हैवही पुकारे धूप छांव कोबचा रखा है उसने भारत के गांव कोसीने से लगा कर रखता हैहर सुबह और हर शाम कोछत टपकती है उसके काच्चे घर कीफिर भी वो बारिश की दुआ करता हैखुद की खुशी को किनारे करकेवो खुदकुशी कर लेता हैकभी बारिश की कमी , कभी ओलो की मारकभी बीज खराब , कभी कर्ज की तलवारइस सबसे वो खामोश हो जाता हैमिट्टी से उपजा किसान, मिट्टी में खो जाता है

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