भूख – डी के निवातिया

भूख

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ये भूख जाने कैसी है, मिटती नहींतन-मन को तृप्ति, मिलती नहींजो जितना अधिक पा जाता हैचाहत फिर दोगुना बढ़ जाता हैकोई दो जून भरपेट को तरसता हैकही अन्नपूर्णा प्रेम अटूट बरसता हैजब मालिक वो लाखो का थानौकर को खुदा समझता थाकरोडो का जब से व्यापार हुआहनन करना अब अधिकार हुआविलासिता के नित नए आयाम गढ़ता हैमुलाज़िम पर पाई पाई को भड़कता हैतिजोरी में माल जमा बेहद बे-शुमार हैफिर भी सूरत से दिखता बेबस-लाचार हैनियत चोरी की ऐसी बनी रहती है दिल में खोट लिएकर सरकारी बचाने को जाने कितने कारक ओट लिएसेवक की सेवा के नाम चढ़ा दिए बही खाते झूठे कितनेहकीकत में पगार से भी काट लिए उस जालिम ने उतनेकैसी ये हवस है कैसी ये भूख हैदो रोटी के नाम पर मची लूट हैजाने कब इंसान खुद को समझ पायेगाजीवन में पर पीड़ा का भान हो पायेगानहीं अगर संभल पाया तो ऐसे ही मिट जाएगाअगर समझ गया तो युग परिवर्तन हो जाएगा !!

डी के निवातिया

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12 Comments

  1. Bhawana Kumari 08/06/2018
    • डी. के. निवातिया 14/06/2018
  2. Rajeev Gupta 08/06/2018
    • डी. के. निवातिया 14/06/2018
  3. Shishir "Madhukar" 10/06/2018
    • डी. के. निवातिया 14/06/2018
    • डी. के. निवातिया 14/06/2018
  4. Dr Swati Gupta 11/06/2018
    • डी. के. निवातिया 14/06/2018
  5. C.M. Sharma 13/06/2018
    • डी. के. निवातिया 14/06/2018

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