बिखर जाता है पर्वत भी- शिशिर मधुकर

जिसका मौक़ा लगा उसने मुझे जी भर के लूटा है बिखर जाता है पर्वत भी अगर भीतर से टूटा है बड़ी कोशिश करी मैंने सफर में तल्खियां ना हों कोई समझा नहीं मुझको मुकद्दर ऐसा रूठा है वो मुझसे प्यार करता है और मिल भी नहीं सकता ज़िन्दगी खेल रिश्तों का देखो कैसा अनूठा है उदासी घेर लेती है नज़र कुछ भी नहीं आता हाथ उस मेहरबां का हाथ से मेरे जो छूटा है जड़ें जब सूख जाती हैं छाँव फिर दे नहीं सकता पात इस ठूंठ में मधुकर नहीं बरसों से फूटा है शिशिर मधुकर

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12 Comments

  1. Dr Swati Gupta 07/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 10/06/2018
  2. ANU MAHESHWARI 07/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 10/06/2018
  3. डी. के. निवातिया 07/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 10/06/2018
  4. Bhawana Kumari 08/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 10/06/2018
  5. Rajeev Gupta 08/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 10/06/2018
  6. C.M. Sharma 12/06/2018
    • Shishir "Madhukar" 13/06/2018

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