बस्ते का बोझ

बस्ते का बोझ।।माँ मेरे बस्ते के बोझ में, मेरा बचपन दब रहा है,मोटी मोटी किताबो से, मेरा सुख चैन छिन रहा है।सुबह सबेरे जल्दी उठकर, स्कूल चला जाता हूँ,देर शाम को थका हुआ, स्कूल से वापस आता हूँ,होमवर्क है इतना सारा,मुश्किल से कर पाता हूँ,मेरे छोटे से मस्तिष्क पर, दवाब ज्यादा पड़ रहा है।माँ मेरे बस्ते के बोझ में, मेरा बचपन दब रहा है,मोटी मोटी किताबो से, मेरा सुख चैन छिन रहा है।विज्ञान गणित के प्रश्न हैं ऐसे,चैन न पाने देते हैं,इतिहास भूगोल में उलझा ऐसा,नींद न आने देते हैं,क्या भूलूँ क्या याद करुँ, कुछ समझ न आता है,सामान्य ज्ञान के चक्कर में,दिमाग का दही बन रहा है।माँ मेरे बस्ते के बोझ में,मेरा बचपन दब रहा है,मोटी मोटी किताबो से, मेरा सुख चैन छिन रहा है।खेलकूद के लिए भी, समय नहीं मिल पाता है,कॉम्पटीशन में होड़ है ऐसी,मन बहुत घबराता है,अपनी व्यथा का समाधान, नहीं ढूढं मैं पाता हूँ,मेरी पीड़ा माँ तू ही समझे,इसलिए तुझे बता रहा हूँ।माँ मेरे बस्ते के बोझ में मेरा बचपन दब रहा है,मोटी मोटी किताबो से, मेरा सुख चैन छिन रहा है।By:डॉ स्वाति गुप्ताhttps://youtu.be/h41qDasHXlE

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12 Comments

  1. mukta 05/06/2018
    • Dr Swati Gupta 07/06/2018
  2. Shishir "Madhukar" 06/06/2018
    • Dr Swati Gupta 07/06/2018
  3. Surya kant singh 06/06/2018
    • Dr Swati Gupta 11/06/2018
  4. C.M. Sharma 06/06/2018
    • Dr Swati Gupta 07/06/2018
  5. Bhawana Kumari 06/06/2018
    • Dr Swati Gupta 07/06/2018
  6. डी. के. निवातिया 07/06/2018
    • Dr Swati Gupta 11/06/2018

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