ये प्रदुषण – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

अपनी वसुधा अपनी ये धराखामोश इतनी जैसे कि डरा। है गगन कहते जिसे आसमाजहाँ दिन-रात जलती है शमाकहीं खाली नहीं है सब भराखामोश इतनी जैसे कि डरा। ये प्रदुषण दुशासन के जैसाशोषण है कुशासन के जैसा यहाँ जिन्दा कौन सब है मराखामोश इतनी जैसे कि डरा। बिगड़े हैं भुगोल खगोल में सुधरेंगे कैसे ये मोल में यहाँ खत्म हो रहा सब हराखामोश इतनी जैसे कि डरा। मौसम का कहर है मौत खबर अब तो ठहर है भर रहा जहरयहाँ मीठा कम ज्यादा है खाराखामोश इतनी जैसे कि डरा। पेड़- पहाड़ कटे हजारों में सरे आम बिकते बाजारों में इन्हे रोकने वाला अधमरा खामोश इतनी जैसे कि डरा। ध्वनि- धूंआ अंबार कचरा जिधर भी देखो इसको पसराअब ये सोचो इसको तुम जराखामोश इतनी जैसे कि डरा। वसुंधरा की सेवा कहाँ गई मिलती वो मेवा कहाँ रहीदिखता ही नहीं जो है कराखामोश इतनी जैसे कि डरा।

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5 Comments

  1. Dr Swati Gupta 05/06/2018
  2. mukta 05/06/2018
  3. C.M. Sharma 06/06/2018
  4. Bhawana Kumari 06/06/2018
  5. डी. के. निवातिया 07/06/2018

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