उलझी है ज़िन्दगी – अनु महेश्वरी

भागती सी ज़िन्दगी में जल्दी पाने की होड़ मची,खुद की खुदी के लिए लोग रोंदते औरो की ख़ुशी|फ़ुर्सत नहीं किसी के पास हर इंसान थका सा,ज़िन्दगी में अपनी बढ़ती इच्छाओ से ठगा सा|न जाने कहाँ रुकेगी यह चाहत जिसकी है तलाश,अपने मन के हाथो हारा इंसान दीखता है हताश|आज़ादी की चाह में निजी रिश्तों से दूर जो हुए,खोए खोए से उदास मन भीड़ में भी अकेले हुए|उलझी हैं ज़िन्दगी सब की खुद के बुने जाल मेंमन में है छटपटाहट कैसे निकले इस जंजाल सेकाश समय रहते ही संभल सके इंसान,बच मृगतृष्णा से ज़िन्दगी करे आसान|अनु महेश्वरी

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14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 04/06/2018
    • ANU MAHESHWARI 25/06/2018
  2. Bindeshwar prasad sharma 04/06/2018
    • ANU MAHESHWARI 25/06/2018
  3. Bhawana Kumari 04/06/2018
    • ANU MAHESHWARI 25/06/2018
  4. Dr Swati Gupta 04/06/2018
    • ANU MAHESHWARI 25/06/2018
  5. C.M. Sharma 05/06/2018
    • ANU MAHESHWARI 25/06/2018
  6. mukta 05/06/2018
    • ANU MAHESHWARI 25/06/2018
  7. डी. के. निवातिया 07/06/2018
    • ANU MAHESHWARI 25/06/2018

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