मृगतृष्णा

मृगतृष्णा•••••••••••••छोटे -छोटे पाँव ले जन्माले छोटे -छोटे हाथ ।।छोटे-छोटे कदमों से हीआंगन था लेता माप ।।निर्भरता लगी चुभने फिररोक-टोक नहीं जंचती थी।चंचल मन की मर्जी थी ।आजादी की जल्दी थी ।गली-मोहल्ले खलिहान वो सारे ।।दोस्तों के वो छत-चौबारे ।।भरमाते थे अनुशासन केराह से भटकाते थे ।।चीखते थे कानों में सारेजल्दी-जल्दी बड़े बने हमजल्द बने परिंदे आजाद ।।अब जब सब है अपने हाथ ।।अक्ल समझ का पूरा साथ ।।मर्ज़ी रोती सुबक-सुबक अबआजादी जी का जंजाल ।।ये कैसे बन गए हालात ।।रास न आया हमें विकास ।।चंद सिक्कों में खुशी खरीदते ।चंद सिक्कों में सपने साकार ।सारा शहर था जो कल अपना ।अब पता न अपना हाल ।।उठते-भागते ,गिरते-संभलते ।दही छोड़ अब मथते छाछ।।क्या खोया क्या पाया हमने?बस मृगतृष्णा ही आई हाथ।।।।मुक्ता शर्मा ।।

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8 Comments

  1. Anu Maheshwari 04/06/2018
    • mukta 04/06/2018
  2. C.M. Sharma 04/06/2018
    • mukta 04/06/2018
  3. Shishir "Madhukar" 04/06/2018
    • mukta 04/06/2018
  4. Bhawana Kumari 04/06/2018
    • mukta 04/06/2018

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