कैसे गिराएं अब दीवारों को -शिशिर मधुकर

कोई तो बात है अदावत है जो हमसे हज़ारों को चाँद को कुछ नहीं होगा जा के कह दो सितारों को जलो कितना भी तुम सूरज ताप अपना दिखाने को रोक फिर भी न पाओगे तुम आती बहारों को मकां ऊंचा बनाने की हम ही तो भूल कर बैठे समझ आता नहीं कैसे गिराएं अब दीवारों को कहीं गहराई जो होती तो हम भी सर झुका लेते झुकाएं सर कहो कैसे देखने इन मीनारों को बड़ी शातिर है ये दुनिया इसे हलके में मत लेना अकेला छोड़ देती है ये मुफ़लिस बीमारों को किसी को दोष क्या देना लुटे जो कारवां के संग जाने क्या हो गया हमको जो ना समझे इशारों को दुल्हन तो बैठ डोली में मधुर सपने बुनें मधुकर बोझ सहना ही पड़ता है लेकिन बेबस कहारों को शिशिर मधुकर

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14 Comments

  1. Bhawana Kumari 27/05/2018
    • Shishir "Madhukar" 28/05/2018
  2. C.M. Sharma 28/05/2018
    • Shishir "Madhukar" 28/05/2018
  3. Rajeev Gupta 28/05/2018
    • Shishir "Madhukar" 28/05/2018
  4. rakesh kumar 28/05/2018
    • Shishir "Madhukar" 28/05/2018
  5. डी. के. निवातिया 28/05/2018
    • Shishir "Madhukar" 28/05/2018
  6. ANU MAHESHWARI 28/05/2018
    • Shishir "Madhukar" 28/05/2018
  7. davendra87 28/05/2018
    • Shishir "Madhukar" 28/05/2018

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