जमीर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

लफ्जों के खेल में, हसरतों के दाग लग गयेरिश्ते जलील हो गये, नफरतों में आग लग गये। कितनी अच्छी भली, चल रही थी उनकी गृहस्थी मति फिर गई, न जाने कौन से दिमाग लग गये। जिसे समझ रहे थे अपना रकीब , अपना मुकद्दर अपने घर में ही छिपे, आस्तीन के नाग लग गये। उजाड़ कर रख दिया जलिमों ने,हंसता हुआ चमनकिस्मत क्यों रूठी,जो जीवन के गुणा भाग लग गये। बिन्दु आवाक ही देखता रहा, इन तस्वीरों को बचे हुए जमीर को नोचने लिए काग लग गये।

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4 Comments

  1. Bhawana Kumari 27/05/2018
  2. C.M. Sharma 28/05/2018
  3. डी. के. निवातिया 28/05/2018
  4. Shishir "Madhukar" 28/05/2018

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