बेगैरत

आबरू मेरी चाहतों कीरोज ही लुटती हैतमन्नाओं के तकिये परसपने रोज सिसकते हैं |मुक़द्दस्त मालिक हो गयादेखो ये जहां मेरामुझे उधर घूमाते हैं जिधरअच्छा समझते हैं |चीखें भी मेरी ख्वारबड़ी बेआवाज उफ्फलोग रोना समझतें हैंजब आँशू टपकते हैं |लुटते भी हैं हमअपने ही हकीम सेवो दवा करते हैं हमदुआ के लिए झगड़ते हैं |शाही खिताब लूटने काहै दौर ज़माने मेंऊपर उठते लोग जानेकितनों को कुचलते हैं |गले लगाकर अश्कपौछने की है आदत मुझेजाने क्यूँ लोग मुझेबड़ा बेगैरत समझते हैं |

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2 Comments

  1. Dr Swati Gupta 26/05/2018
  2. Rakesh kumar 26/05/2018

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