ज़माने की बदमाशी

ये तो नाइंसाफी है किमोहब्बत आपकी प्यासी हैआप ढूँढते हैं बाहरअपनों में छाई उदासी है |भर लीजिये बाँहों मेंकितना भी चोरी सेप्रीत वही टिकती हैजो दिल की साची है |बाहों में भरी चूड़ियाँमुस्कुराहट कोई लुटाती हैकांटे चुनने के लिएकोई दामन अपना बिछाती है |मन में तेरा इन्तजार लिएएक जोगन घर में दासी हैजो छोड़ आई जहां अपनाअब सिर्फ तेरी साथी है |देख तुझे जो बगियासी खिल जाती हैआज तेरी राहों मेंनजरें अपनी टिकाती है |दीवारों में दबी सिसकियाँचेहरे पर खामोशी हैघर बन रहे हैं खंडहरज़माने की बदमाशी है |

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10 Comments

  1. C.M. Sharma 22/05/2018
  2. डी. के. निवातिया 22/05/2018
  3. Bhawana Kumari 22/05/2018
  4. Dr Swati Gupta 22/05/2018
  5. Rakesh kumar 22/05/2018
  6. ANU MAHESHWARI 22/05/2018
  7. Madhu tiwari 23/05/2018
  8. Rakesh kumar 23/05/2018
  9. Shishir "Madhukar" 24/05/2018
    • rakesh kumar 24/05/2018

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