विक्षोभ – आलोक पाण्डेय

विक्षोभ ——————–स्तब्धित दिशाएँबेकली हवाएँव्यथित अंबरकह रहा आज -बेहद निर्मोही ,बडी निर्दयता से ‘ कैसी ‘ -मिट रही , क्यों कोई मिटा रहा लाज !नष्ट हो रहे प्राण हा ! विकट रूग्णता , घोर त्राण !नष्टप्राय संसाधन हो रहे विलुप्त ,दुःखद, मिट रहे संतान ;गंभीर विप्लव की ओर बढ रही धरासौम्यता भी खो चुकी आज लुप्त , हो रहे मृतप्राय जनमानस वितान !लूट रही सौम्य प्रकृति अनवरत…परिणाम ,दुःखद् भयावह जन विकल उद्वेलितभाव – भंगिमाएँ भी चढी हुयीनिरस , निकृष्ट |हो रहा सब कुछ अनर्थ,कराल- काल , कवलित करने राखदीखा रही किसी अवश्यंभावी विध्वंस को !बहुत देर हो चुकी बीते क्षण-क्षण ,घीर चुकी नैतिकतासब उपक्रम व्यर्थहो गयी मलिन रेखा सम्पन्नता की ;क्षीण उर्वरा , बहुत कटुता ! विकलता !! विक्षोभ !!!© कवि आलोक पाण्डेय

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5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 15/05/2018
  2. C.M. Sharma 16/05/2018
    • Rakesh kumar 16/05/2018
  3. डी. के. निवातिया 16/05/2018
  4. Rakesh kumar 16/05/2018

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