शहर

अजनबी से होते हैं शहरदिन के रौशनी में भी होते है अंधेरे वहांचारो तरफ शोर बस शोरसाँसों को भी धडकन का एहसास कहाँ होता हैना कहीं बरगद का पेड़ नजर आता हैना कोयल की कूक सुनाई देती हैघरो के कमरे भी तो छोटे होते हैउनमे रहने वाले लोगो की तरहना कहीं आँगन मिलता कौओं को कावं-कावं करने कोना कोई बिल्ली नजर आतीसीके पर रखे दूध पीने कोशहर में इंसान तो इंसान जानवर भी अजनबी होते हैकुत्तो को बड़े बाबूओं का बंगला नसीब होता हैगऊ माता यहाँ सडको पर भटक रही होती हैअजनबी से शहर में इंसान भीकहाँ इंसान बने रह पाते हैपता नहीं दिन भर कहाँभटकते रहते हैनींद इन्हें कहाँ आती है एसी में भीइनकी प्यास कहाँ बिसलेरी की बोतले भी बुझा पाती है ——अभिषेक राजहंस

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3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 12/05/2018
  2. Abhishek Rajhans 13/05/2018
  3. Bhawana Kumari 14/05/2018

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