विज्ञापन युग

आजकल कविताओं का मूल्य नहीं है गीत-संगीत का भी नहीं प्यार का तो थोड़ा सा भी मूल्य नहीं है .पर मूल्य बढ़ा है अब उन वस्तुओं का जो कभी बिकी नहीं है .जो अब बिक रही है पानी आग और हवा भी .बिक रही है अब लोगों की मान -इज्जत .लोगों की भूख देह की सभी अंग -प्रत्यंग .यह विज्ञापन का युग है माँ-बाप की प्यार और मातृदुग्ध का तो मूल्य ही नहीं है .

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10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 09/05/2018
    • chandramohan kisku 12/05/2018
  2. डी. के. निवातिया 09/05/2018
    • chandramohan kisku 12/05/2018
  3. Bhawana Kumari 09/05/2018
    • chandramohan kisku 12/05/2018
  4. C.M. Sharma 10/05/2018
    • chandramohan kisku 12/05/2018
  5. Dr Swati Gupta 10/05/2018
    • chandramohan kisku 12/05/2018

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