खुद को समझे है ज्ञानी सब – अनु महेश्वरी

घर भरा रहता था, रिश्तेदारों से कभी,समय के साथ बदले मायने, दूर है सभी।लगे है भूलने रिश्तो की मर्यादा सब,निभाने की इन्हें फुर्सत भला कहाँ अब?अखरने लगा बड़ो का समझाना,कोन, किसकी चाहता है सुनना?अपने में रहे है आज सभी मस्त,जिसे देखो इस जहाँ में है व्यस्त।कहाँ रही है अब देखो शांति,पाल रखी सभी ने जो भ्रान्ति।खुद को समझे है ज्ञानी सब,औरो की सुने क्यों और कब?अनु महेश्वरीबेंगलुरु

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12 Comments

  1. Dr Swati Gupta 09/05/2018
    • ANU MAHESHWARI 09/05/2018
  2. C.M. Sharma 09/05/2018
    • ANU MAHESHWARI 09/05/2018
  3. Shishir "Madhukar" 09/05/2018
    • ANU MAHESHWARI 09/05/2018
  4. Chandramohan Kisku 09/05/2018
    • ANU MAHESHWARI 09/05/2018
  5. डी. के. निवातिया 09/05/2018
    • ANU MAHESHWARI 09/05/2018
  6. Bhawana Kumari 09/05/2018
    • ANU MAHESHWARI 09/05/2018

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