सबरनाखा की स्थायित्व

वह कल-कल बह रही सबरनाखा नदी जिसकी गोद में खेला था बचपन में .देख रहा हूँ अब कल-कारखानों की प्यास बुझाने में सूख गई है .उसकी देह से लिपटी दूर तक फैली लाल और सफ़ेद साड़ी,बालू की धीरे-धीरे उसकी देह से छीनी जा रही है बहुत ही ‘कामुकता’के साथ .फिर भी मनुष्यों को चैन नहीं बड़े-बड़े डेम बनाकर सबरनाखा ‘माँ’की हाथ-पैर को बाँध दिया है देह की लाल गोस्त झिलमिल चमकनेवाली नदी की सोना बालू कुदाल से ,मशीन से खोद रहे है .नदी पर अनेक अत्याचार चलाने के बाद तैयार किया है पूलऔर सभ्य मानव(?)उसपर चढ़कर आनंद से हँस रहे है प्रतिदिन सुबह-शाम .*सबरनाखा=झारखण्ड की प्रमुख नदी जिसकी बालू में सोना मिलता है .

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12 Comments

  1. Dr Swati Gupta 08/05/2018
    • Chandramohan Kisku 09/05/2018
  2. Bhawana Kumari 08/05/2018
    • Chandramohan Kisku 09/05/2018
  3. ANU MAHESHWARI 09/05/2018
    • Chandramohan Kisku 09/05/2018
  4. C.M. Sharma 09/05/2018
    • chandramohan kisku 09/05/2018
  5. Shishir "Madhukar" 09/05/2018
    • chandramohan kisku 09/05/2018
  6. डी. के. निवातिया 09/05/2018
    • Chandramohan Kisku 10/05/2018

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