बुत्तपरस्ती

उम्र की उस दहलीज पर आकर बिखर गया हूँ मैंसिर्फ रुशवाई ही मिली जिधर भी गया हूँ मैंकूबतों का कूबड़ काम ना आ सका मेरेनाम बचाने जाने कितना खुद को कुतर गया हूँ मैंख़ाक भी ना जोड़ पाया जिंदगी खर्च करकेअपने ही दामन से इतना उलझ गया हूँ मैंबेइंतिहा निकले हैं कांटे मेरे दामन मेंअपनी अच्छाईयों से झुलस गया हूँ मैंकहते हैं मैं पहले जैसा ना रहा, तो क्याकुछ बिगड़कर थोड़ा तो सुधर गया हूँ मैंकागजों पर उड़ेल दूँ दिल के सारे दर्दकब का जिंदगी से पहले बिखर गया हूँ मैंकरके यकीन मुझपर थोड़ा तो रहम करइस दिल की गुस्ताखियां ही भुगत रहा हूँ मैंकभी तो महका दे गुलाब आबो बहार काबुत्तपरस्ती में जाने कब से बिफर रहा हूँ मैं

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5 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 08/05/2018
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/05/2018
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 08/05/2018
  4. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 08/05/2018
  5. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 09/05/2018

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