तुम्हारा प्यार पाकर

तुम्हारा प्यार पाकर पहाड़-पर्वतों के पेड़-पौधे अति सुन्दर ‘हरे’हुए है नदी भी अपनी चाल बदली है कल-कल गीत गाकर बहती जा रही है कोयल भी गा रही है घर की कबूतर भी गुटुर-गू कर रहे है तुम्हारा प्यार पाकर पेड़ की टहनी की फूल और अधिक सुन्दर हुआ है सुबह की शबनम हँस रही है और रात की चन्द्रमा को चुहुल सूझी है बच्चे की गालों को चूमकर पलभर में दूर आसमान को चढ़ रही है इसलिए शायद बच्चे भी मंद -मंद मुस्कुरा रहे है तुम्हारा प्यार पाकर तुम्हारा प्यार पाकर मैं भी फाल्गुन को उठाया हूँ अपनी गोद में फूलों की रंग से रंगा हूँ सुगंध और मीठी रस को कलम की स्याही बनायी हूँ जिससे अब मैंप्यार की कविता लिखने में लगा हूँ .

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15 Comments

  1. rakesh kumar 06/05/2018
    • Chandramohan Kisku 06/05/2018
  2. C.M. Sharma 06/05/2018
    • Chandramohan Kisku 06/05/2018
  3. Bindeshwar Prasad sharma 06/05/2018
    • Chandramohan Kisku 06/05/2018
  4. davendra87 07/05/2018
    • Chandramohan Kisku 07/05/2018
  5. Dr Swati Gupta 07/05/2018
    • Chandramohan Kisku 07/05/2018
  6. डी. के. निवातिया 07/05/2018
    • Chandramohan Kisku 07/05/2018
  7. Bhawana Kumari 08/05/2018
  8. chandramohan kisku 13/05/2018
  9. chandramohan kisku 13/05/2018

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