न रही चाह ये मेरी।।

न् रही चाह ये मेरी कि आसमान को छू जाऊँ,इस जमीं से जुड़ी हूँ ,इस जमीं पर अपना नाम बना जाऊँ मैं,न् ही औकात है मेरी कि सूरज की तरह जगमगाऊँ,झिलमिलाऊँ एक दीये की तरह,औरों को रौशनी दे जाऊँ,सागर की तरह विशाल नहीं हूँ,सब कुछ स्वयं में समा जाऊँ,बन जाऊँ एक नदी की तरह, प्यासों की प्यास बुझा जाऊँ,एक बड़ा वृक्ष नहीं हूँ, सबको छाया मैं दे पाऊँ,रहूँ फूलों के पौधों की तरह,औरों को खुश्बू दे पाऊँ,तारों की तरह देदीप्यमान नहीं हूँ मैं,पर स्वाति नक्षत्र की तरह बन पाऊँ,अपने प्यार की छत्रछाया में अपनों को खुशियाँ दे पाऊँ।।By:Dr Swati GuptaYou can listen me by clicking the link given below:https://youtu.be/z_Rh-9_I5GE

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14 Comments

  1. ANU MAHESHWARI 04/05/2018
    • Dr Swati Gupta 05/05/2018
  2. Bindeshwar prasad sharma 04/05/2018
    • Dr Swati Gupta 05/05/2018
  3. Bhawana Kumari 04/05/2018
    • Dr Swati Gupta 05/05/2018
  4. C.M. Sharma 05/05/2018
    • Dr Swati Gupta 05/05/2018
  5. डी. के. निवातिया 05/05/2018
    • Dr Swati Gupta 05/05/2018
  6. Shishir "Madhukar" 05/05/2018
    • Dr Swati Gupta 05/05/2018
  7. Chandramohan Kisku 07/05/2018
    • Dr Swati Gupta 07/05/2018

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