कोई तो झांक कर देखे – शिशिर मधुकर

अधिक पाने की चाहत में यहाँ थोड़ा भी खोया हैवही काटा है इंसा नें जो निज हाथों से बोया हैस्वप्न जब टूटते हैं आँखों में आंसू नही दिखतेकोई तो झांक कर देखे ये मनवा कितना रोया हैबुझा चेहरा थकी आँखें बातें बोझिल सी करता है गुमां होता है यूँ इंसान वो कब से ना सोया हैबड़ा मज़बूर है इंसा जुदा बाहर से दिखता है ज़रा भीतर नज़र डालो इसने जख़्मों को ढोया हैतपती रेती कहो कैसे उसे भूले यहाँ मधुकरजिसने बरसा के अपना जल उसके तन को भिगोया हैशिशिर मधुकर

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10 Comments

  1. Bhawana Kumari 30/04/2018
    • Shishir "Madhukar" 30/04/2018
  2. C.M. Sharma 01/05/2018
    • Shishir "Madhukar" 01/05/2018
  3. Dr Swati Gupta 01/05/2018
    • Shishir "Madhukar" 01/05/2018
  4. डी. के. निवातिया 01/05/2018
    • Shishir "Madhukar" 01/05/2018
  5. Anu Maheshwari 03/05/2018
    • Shishir "Madhukar" 04/05/2018

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