बुलबुल-ऐ-चमन – डी के निवातिया

बुलबुल-ऐ-चमन

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कफ़स-ऐ-क़ज़ा में कैद बुलबुल-ऐ-चमन अपना हैबनाएंगे जन्नत-ऐ-शहर इसे लगे बस ये सपना है फ़िक्र किसे मशरूफ सब अपनी बिसात बिछाने मेंनियत में ,राम-राम जपना पराया माल अपना है !!

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डी के निवातिया

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कफ़स = पिंजरा, शरीर,जालीक़ज़ा= भाग्य, अधिकारस्क्षेत्र, किस्मत भरोसेमशरूफ = काम में लगा हुआ, संलग्न

 

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12 Comments

  1. Bhawana Kumari 21/04/2018
    • डी. के. निवातिया 01/05/2018
  2. C.M. Sharma 21/04/2018
    • डी. के. निवातिया 01/05/2018
  3. ANU MAHESHWARI 21/04/2018
    • डी. के. निवातिया 01/05/2018
  4. Bindeshwar Prasad sharma 22/04/2018
    • डी. के. निवातिया 01/05/2018
  5. Shishir "Madhukar" 22/04/2018
    • डी. के. निवातिया 01/05/2018
  6. md. juber husain 01/05/2018
    • डी. के. निवातिया 07/05/2018

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