नहीं हो तुम कमज़ोर – अनु महेश्वरी

 रोज़ हो रहा चीरहरण,पर बचाने, कोन है आएगा?उठो, बनो वीरांगना, खुद को ही सम्भलना होगा,मूक बने इस समाज में खुद को ही बचाना होगा|इस समाज से क्या उम्मीदें रखनी,जो हो चुकी है बहरी सी, यहाँ ?चाले नित नई चलते शकुनि,दुःशाशन का साथ देने को जहाँ|ऐसे लोगों से क्या उम्मीदें रखनी,जब आँखे मूंदे है सभी?होती परवा समाज को अगर,न होती घटनाओ की पुर्नावृत्ति कभी|किस से रखे उम्मीदें यहाँ,खबरें भी हो, बिकाऊ जहाँ?किसे, कहाँ, फरक पड़ता,किसी की पीड़ा से यहाँ|उठो, सबल बनो,नहीं हो तुम कमज़ोर?बस अबला, कह कह,बना रखा तुम्हे कमज़ोर|पहचानो अपनी शक्ति को,क्यों भूल बैठे झाँसी की रानी को?जिसने लोहा ले लिया था अंग्रेजो से,तो क्या तुम न लड़ पाओगी घर के ही दानवों से?अनु महेश्वरीचेन्नई

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10 Comments

  1. डी. के. निवातिया 21/04/2018
    • ANU MAHESHWARI 21/04/2018
  2. Bhawana Kumari 21/04/2018
    • ANU MAHESHWARI 21/04/2018
  3. Bindeshwar Prasad sharma 22/04/2018
    • ANU MAHESHWARI 22/04/2018
  4. Shishir "Madhukar" 22/04/2018
    • ANU MAHESHWARI 22/04/2018
  5. C.M. Sharma 23/04/2018
    • ANU MAHESHWARI 24/04/2018

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