आखिर क्यों तुम समझ न पाए

कब से बैठी आस लगायेकितने दिवस के बाद तुम आयेमुझको है जाने की जल्दी आखिर क्यों तुम समझ न पाएवक़्त बड़ा,बेरहम हुआ हैतुम्हे मिला न मेरा हुआ हैबेबस और लाचारी सी है श्वासें भारी भारी सी हैंविकट अश्रु के बादल छाएआखिर क्यों तुम समझ न पाएतुमको मैंने दर्पण जानापर तुमने ही न पहचानाटुकड़े टुकड़े तोड़ रही हैकैसे मुझे निचोड़ रही हैपीर प्रलय के अक्स दिखाएआखिर क्यों तुम समझ न पाएएक कदम भी चलना मुश्किलदृश्य लक्ष्य के लगते धूमिलआओ फिर से साहस भर दोकलुषित मन को अरुणिम कर दोपुष्प उम्मीदों के मुरझाएआखिर क्यों तुम समझ न पाएमद्धिम सा उजियारा देखाकल फिर टूटा तारा देखाअंतस में एक इच्छा जागीकिंतु हाय ! मै बड़ी अभागीशब्द हृदय में रही छुपाये आखिर क्यों तुम समझ न पायेउत्सव के दिन साथ गुजरतेपीड़ा में क्यों तन्हा रहतेखुद से कितनी बातें कर लूंतुम बिन रिक्त रहूं,जो भर लूंमन का हर संदेश सुनाएआखिर क्यों तुम समझ न पाएअब आये भी तो गैरों जैसेहाल न पूछा अपनों जैसेहृदय लिपट कर जो रो पातीशायद फिर जीवित हो जातीप्रतिक्षण थी बाहें फैलायेआखिर क्यों तुम समझ न पाएआखिर क्यों तुम समझ न पाए। देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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6 Comments

  1. Madhu tiwari 20/04/2018
  2. C.M. Sharma 21/04/2018
  3. Bhawana Kumari 21/04/2018
  4. ANU MAHESHWARI 21/04/2018
  5. डी. के. निवातिया 21/04/2018
  6. Shishir "Madhukar" 22/04/2018

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