बोझ….सी.एम्. शर्मा (बब्बू)….

मन, काल कोठरी में बंद…दीवारों से टकराता है…गहरे डूब जाता है…कभी…ठक ठक सुनायी देती है…धीमें से दबे पाँव…चलता हो जैसे कोई…या डूबने वाला….रुक रुक के सांस लेता है…समय निकल जाए सही…जलती हुई चिता से….उठते हुए धूंएं में….तस्वीर तेरी लहराती हुई…गुम हो जाती है…दूसरे ही पल…आग की लपटों में…काया झुलस जाती है…स्याह रंगी चादर…बिछ सी जाती है…तेरे बिखरे बालों सी…दूर कहीं से सिसकियाँ…धीमें से….रुक रुक के आती हैं….एक बोझ सा लिए बैठा हूँ…मेरी धड़कन तुझसे थी…या तेरी सिसकियों में मैं…\/सी.एम्. शर्मा (बब्बू)….

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10 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 19/04/2018
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 21/04/2018
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 20/04/2018
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 21/04/2018
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/04/2018
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 21/04/2018
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 20/04/2018
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 21/04/2018
  5. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 21/04/2018
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 24/04/2018

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