न्याय पर प्रश्नचिन्ह

मेरे अन्दर की लेखिका,

मुझे जला रही है।

कई बार बैठे हुए ,सोते हुए

यूँ लगता है

जैसे फिर कोई दामिनी,

मुझे पुकार रही है।

कहने को कुछ ,

कलम विवश हो जैसे ।

शब्द स्तब्ध है ,

सहमे हुए है ऐसे।

कागज भी शर्मिंदा है ,

स्वयं पर आवरण ओढ़कर ।

न्याय क्यों मौन है अब भी,

पापियों का नंगापन देखकर।

कृत्य घिनौने करते समय,

क्यों अधर्मी ईश्वर से नहीं डरते।

आत्मा को कलंकित करते समय,

मंदिर परिसर को भी नहीं छोङ़ते।

राजनीति के नाम पर न जाने कितनी असीफा की,

हर दिन बलि चढ़ती रहेगी ।

कब तक समाज तमाशा देखेगा,

कब तक अदालत बलात्कारियों को बरी करती रहेगी।

देश में हमारे न्याय पर ही ,

बङ़ा प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है ।

क्यों कह रही हूं ऐसा?

क्योंकि बेटी के लिए आवाज उठाने वाले पिता का थाने में कत्ल हुआ है।

कवियित्री -आस्था गंगवार

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10 Comments

  1. Abhishek Rajhans 18/04/2018
    • Astha Gangwar Astha Gangwar 19/04/2018
  2. davendra87 davendra87 18/04/2018
    • Astha Gangwar Astha Gangwar 19/04/2018
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 19/04/2018
    • Astha Gangwar Astha Gangwar 19/04/2018
  4. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 19/04/2018
    • Astha Gangwar Astha Gangwar 19/04/2018
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 20/04/2018
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/04/2018

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