आग (पियुष राज ‘पारस’)

मेरी नयी कविता कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर ,आपको कैसा लगा जरूर बताएं ,आपकी प्रतिक्रिया के आशा करता हूं 🙏🏻🙏🏻आगज्ञान का कोई मोल नहींयहाँ सुर समाया है काग मेंप्रतिभा झुलस रही हैआरक्षण के आग मेंतार-तार हो रही आबरूइस भारत जैसे बाग मेंबेटियां जल रही हैबलात्कार के आग मेंशादी अब तय होता हैसिर्फ पैसों की बात मेंबहन-बेटी झुलस रही हैदहेज के इस आग मेंवोट बैंक के खातिर अबदेश को मिला रहे खाक मेंभारत को बांट रहे हैन जाने कितने जात मेंजाति-धर्म पर लड़ रहे सबअपनी झूठी आन-शान मेंदेश का होगा तभी भलासिर्फ इंसान हो हििंिंदुस्ताननस्स् में*मोक्ष न मिलेगा यारों*काशी-कावा या गंगा में*ये होता उनको नसीबजो लिपट के जाते तिरंगा में© *पियुष राज ‘पारस’दुमका झारखंडP83/13-04-2018

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3 Comments

  1. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 16/04/2018
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 17/04/2018
  3. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 18/04/2018

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