स्त्री

शौक रखती है जीत केमुस्कुराना जानती हैदर्द को गले लगाकरहराना जानती हैन जाने कितनी बारहुई पीड़ा बृहद अपारहाथ नही जोड़तीटूट जाती हैउम्मीद नही छोड़तीपलक पुलक अधीर सीबांधकर रखती हैस्थिर हृदय सुधीर सीखुद बंध जाती हैस्नेह से, ममता सेनही भूलती है,कोई भी किरदारसंजीदा,चंचल मासूम- मजेदारतुम भूल जाओखो जाओ अपने मे कहींवो याद रखती हैसोमवार से लेकरहर इतवार,सिर्फ तुम्हारे लिएन जाने कौन-कौन सेव्रत,संकल्प लिएलड़ जाती है हर बला सेहर ब्यवधान सेजो तुम्हारी राह रोकेखड़े हैतुम्हे मालूम नही और तुमने देखे भी नहीजश्न में डूबे पड़े हैंजो तुम्हारे दिन तुम्हारी रातेंउनके पीछे छुपी हैकितनी अनसुनी अनकही बातेंकितनी पीड़ा कितनी कराह हैयूँ ही नही आसान तुम्हारी हर राह है,पर क्या तुम समझ पाओगे,जान पाओगेशायद नहीशायद नही क्योकि तुम बेहदव्यस्त होअपने मोद मेंअपने प्रमोद मेंमदमस्त हो,सुख में,ऐश्वर्य मेंपर शायद ‘आनंद’ में नही’आनंद’ जिसे वो जानती हैजीती है,गाती हैरोती है ,अश्रु बहाती हैतुम्हारे साथ मिलकरउत्सव मनाती हैऔर तुम एक ‘स्त्री’ के इतरउसे कुछ नही जानते होन पहचानते होबस बांध देते होरिश्तों के अबूझसवालों मेंजिनके उत्तर नही हैतुम्हारे भी पास,तुम्हे होगा एहसासबेशक,जरूर लेकिन तुम जता नही पाओगेबस अकेले अंधेरे में कहींतन्हा उदास, मजबूररोओगे,पछताओगेछोड़ना चाहोगे अपना सुंदर संसार भीतब भी कहीं सेएक आवाज आएगीतुम्हे झकझोरेगीजगाएगीतुम आज भी अकेले नही होदेखो अपने हृदय कीगहराइयों मेंमैं हूँ आज भी तुम्हारे पास सदा से तुम्हारे साथ थीतुम अकेले नही हो।और मिल जायेगीतुम्हे जीने की उम्मीद फिर सेऔर वो मुस्कुराएगीउसी ‘आनंद’ मेंजो परे है तुम्हारी सोचतुम्हारी कल्पनाओं सेफिर से ।।देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/04/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 17/04/2018
  3. deveshdixit DEVESH DIXIT 30/04/2020
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 04/05/2020

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