धूल

बारीक महीन सीउमड़ती घुमड़तीहवाओं के संगमचलती गिरतीफूलों पत्तियों परजमती फिसलतीतुम लाख झाड़तीपोंछती हटाती दबे पांव चुपके से फिर आ जातीबांध दो कस कररख दो बंद करछुपा कर किवाड़ में कोई निशानीजब खोलेगेएक चादर बनीचिढ़ाती हुईमुस्कुराती ताने मारती ।कितने दिवस बीत गएतुम्हारी याद में आयेभूल जाते होअपनी सबसे प्यारीअनमोल चीज कोहृदय से लगायेफिरते थे जिसेगाते मुस्कुरातेहक जताते,अनगिनत ख्वाब सजाए ।कुछ पुरानी किताबों,तस्वीरों,उपहारोंपर जमी “धूल” जो तुम्हारे लिए है बेकार “निर्जीव” सीप्रश्न चिन्ह लगाती तुम्हारे बोध तुम्हारी संवेदना परकण कणदिखती हैशास्वत सजीव सी।। देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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4 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma 12/04/2018
  2. डी. के. निवातिया 12/04/2018
  3. C.M. Sharma 15/04/2018
  4. Shishir "Madhukar" 15/04/2018

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