भावना का ज़ोर..!

आज मेरी लेखनी में,भावना का ज़ोर है।एकांत में हूँ मैं लेकिन,हर तरफ़ बस शोर है॥धीमे-धीमे चल रही है,लेखनी कुछ सोच कर।लिख चुका, न मिट सकेगा,यह विचार हर रोज़ कर॥क्या उचित है क्या नहीं,ये द्वंद्व मन में चल रहा।ध्यान एकल करना चाहा,पर ये मन चंचल रहा॥मन भले स्थिर रहे,व्याकुलता चहुँ ओर है।आज मेरी लेखनी में,भावना का ज़ोर है॥यह उसे आभास है कि,भूल अब ना माफ़ हो।कर्म तो मैले रहेंगे,मन भले ही साफ़ हो॥सत्य और मिथ्या का अंतर,फिर समय पर छोड़ कर।लेखनी फिर चल पड़ी,बंदिशें सब तोड़ कर॥‘भोर’ का एहसास है,पर उर ज़रा कमज़ोर है।आज मेरी लेखनी में,भावना का ज़ोर है॥©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’अन्य रचनाओं हेतु www.bhorabhivyakti.tk पर जायें। धन्यवाद!Bhor Abhivyakti

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10 Comments

  1. Chandramohan Kisku 09/04/2018
  2. C.M. Sharma 09/04/2018
  3. Bhawana Kumari 09/04/2018
  4. डी. के. निवातिया 09/04/2018
  5. sukhmangal singh 12/04/2018

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