मुसकुराती चली आई

रख कर दिल पर पत्थर
सबको हंसाती चली आयी
हर लम्हा थी उदास पर
मुस्कुराती चली आयी
मै क्या किसी को रुलाऊँगी
दूसरों की खातिर खुद को
मिटाती चली आयी
क्यों नहीं देखा किसी ने
दिल के जख्मों को
अपने जख्मों का आईना
मै सबको दिखाती चली आयी
दिल रोता रहा नजरें हँसती रही
अपनी इस अदा से सबको
बहलाती चली आयी
दूसरों की खातिर जिया जाता है कैसे
ये सबक मै सबको सिखाती चली आयी ॥

सीमा वर्मा “अपराजिता”

Leave a Reply