पीड़ा (अपराजिता)

टूट चुका है कोना कोनाखंड हृदय के जोड़ सकूं ना,अरसा बीता सुख को छोड़ेमुस्कानों ने नाते तोड़े,सुबह बुझी सी बोझिल बेमननिशा विषैली चीखे उर नम,पर तुम क्या ठुकराओगी नहीपीड़ा क्या तुम जाओगी नही!!युग युग से हो साक्षी मन कीतुम हृदयों की पाती तन की,मुझमे क्या अवशेष तुम्हारानीर अश्रु का है सब खारा,बिंधे चुभे हैं कांटे कितने कोई जगह न बाकी तन में,मृदु शीतल सुवास लाओगी नहीपीड़ा क्या तुम जाओगी नही!!!अरमानों के मेले आतेउम्मीदों के राग सुनाते,साहस सीने से लग जातामंजिल से जुड़ जाता नाता,लेकिन तेरी बंदी बनकरथम जाती हूँ रुँध थक-कर,पथ से अवरोध हटाओगी नहीपीड़ा क्या तुम जाओगी नही!!बड़े धैर्य से तूने पालानित्य निरंतर जपती मालाइष्ट नही हैं सुनने वालेआँचल में माँ मुझे छुपा लेव्यर्थ हुए हैं सारे करतबघात लगाए बैठे हैं सबदुर्बलता का श्राप मिटाओगी नहीपीड़ा क्या तुम जाओगी नही।।विधना का संदेश सुना देअंतिम तट पर मुझको ला दे,नियति नीति कर्म प्रबल कीदृष्टि ज्ञान की दे तर्पण की,अपराजिता अनंत असीमासत चित रूप प्रबुद्ध प्रवीना,मुझसे मेरी भेंट कराओगी नहीपीड़ा क्या तुम जाओगी नही।।………..देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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3 Comments

  1. Madhu tiwari 26/03/2018
  2. Chandramohan Kisku 27/03/2018
  3. डी. के. निवातिया 28/03/2018

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