अपनी दफ्न जिन्दगी बस तलाशता रहा

अपनी दफ्न जिन्दगी बस तलाशता रहारात भर वह कब्र सारी खँगालता रहा।पहले सभी यादें चुन चुन जलाता रहाफिर यादों की राख बैठा झुलसता रहा।आँधी में बेपर जिन्दगी ले उड़ता रहाउड़ते गुबार की मानिंद भटकता रहा।अपने जिस्म की बची साँसें गिनता रहाफिर भी खुद को खुदा का अक्स कहता रहा।मालूम नहीं ये किसकी बद्दुआ थी कि मैंउलझनें सुलझाता खुद ही उलझता रहा।अपने होने का अब क्यूँ अहसास होखोकर जिस्म मैं पेहरन संभालता रहा।…. भूपेन्द्र कुमार दवे00000

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  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 28/03/2018
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/04/2018

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