अपराजिता 15.03.2018

उस रोज तुम्हे टोका नहीतुम जा रहे थे मैंने तुम्हें रोका नहीसुबह तुम्हारे सुरों की लालच मेंअक्सर देर से आती थीखिड़कियों से झांकती धूप मुस्कुराती थी ।मै नींद का दामन थामेसपनो की पगडंडियों पर, जब भी चलने की कोशिश करतातुम्हारा तीव्र स्वर उलाहना देता..मैं जागी हूँ और तुम नींद को गले लगाए होवाह जी क्या खूब निभाये हो..मैं सजल नेत्रों से तुम्हे निहारतातुम्हारे माथे पर हाथ फेर कहता,देख तेरा हाथ पकड़े हूँमै तुझसे अलग थोड़े हूँ,तेरी पीड़ा तेरी तकलीफ का साझेदार हूँमैं वही तेरा चहेता किरदार हूँतुम निश्छल सागर सी अपनीपीड़ा के ज्वार समेट शांत हो जाती,और अत्यंत अचंभित चकितसिरहाने खड़ी जिंदगी मुस्कुरातीउस रोज ऐसा हुआ नहीतुमने पुकारा पर मैंने सुना नही ।तीन दिवस से जागी आंखों की प्यास में थीनींद उसी दिन की तलाश में थी,तुम्हारी सखी हमजोली पीड़ातुम्हे बड़ी तीव्रता से तोड़ रही थीसुबह दूर खड़ी सिसक सिसक कर रो रही थी,यंत्र तंत्र सब बेबस लाचार थेबुत बने खड़े सारे पहरेदार थे,हाय विधाता ! वो वीभत्स स्वरूप,संयंत्रों में जकड़ा तुम्हारा रूप,देखा न गयाहाथ तुम्हारे हाथ से छूट सा गयावाह रे !!निद्रा तेरा कपट जालआखिर भ्रमित कर गयामैं फर्श पर बैठा सो गयाठीक उसी क्षण नियति मुस्कुराईतुम हृदय से चीखी चिल्लाईकिंतु हाय कोई ध्वनि मुझ तक न आई।स्तब्ध स्तंभित अवाक सहसा खुली जब मेरी आँखेकाल चक्र तुम्हे समेट चुका थामैं हार वो जीत चुका था…. देवेंद्र प्रताप वर्मा”विंनीत”हृदय उदगार दिनाँक 15.03.2018 को छोटी बहन प्रेम और पीड़ा की संगिनी रचयिता सीमा वर्मा”अपराजिता” की लंबी बीमारी के दौरान लखनऊ में आकस्मिक निधन…

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5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 23/03/2018
  2. Madhu tiwari 23/03/2018
  3. Bhawana Kumari 23/03/2018
  4. डी. के. निवातिया 24/03/2018
  5. C.M. Sharma 25/03/2018

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