ज़िद और अदब

वो तेरी तरसी निगाहों कावो हर बार का उलाहना ।।और धक् से मेरी धड़कन कायूँ आने से रुक जाना ।।पास आने की तेरी शिद्दत कामुझे झूठ-मूठ सताना ।।और मेरा वही मान कर भीन मानने का रवैया मनमाना ।।तेवर में भर कर गुस्सायूँ तेरा वहीं रुक जाना ।।मना लूं तुम्हें लगा कर गलेपर मेरा तुझे यूँ झूठा खपाना ।।नयनों की कोर से हुई शरारत कासारा राज़ खोल जाना ।।पर तुझ मासूम का एक और पत्र प्रार्थना कामुझे निवेदित कर जाना ।।मुस्काना, लजाना, मेरा आगे बढ़ करफिर रुक जाना ।।पर तेरे छूने की अदब कामुझ पर बादल बन छा जाना ।।और मेरे मोम के किले सी ज़िद काढह जाना – ढह जाना ।।।।

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8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 22/03/2018
    • mukta 22/03/2018
  2. डी. के. निवातिया 22/03/2018
    • mukta 22/03/2018
  3. Madhu tiwari 22/03/2018
    • mukta 22/03/2018
  4. Bindeshwar prasad sharma 22/03/2018
    • mukta 22/03/2018

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